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मेरी पहली दोस्त

जब हुआ मेरा सृजन, माँ की कोख से| मैं हो गया अचंभा, यह सोचकर||
कहाँ आ गया मैं, ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द| इसी परेशानी से, थक गया मैं रो-रोकर||
तभी एक कोमल हाथ, लिये हुये ममता का एहसास| दी तसल्ली और साहस, मेरा माथा चूमकर||
मेरे रोने पर दूध पिलाती,
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से  भी बढ़कर||

उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||

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