लकीर (कविता)---सुजाता सक्सेना

मैं
इक
लकीर
बनाती अगर
होती हाथ
मेरे कलम,
समां देती उसमे
अपने
सारे सपने
और आशाओं के महल !
इस सिरे से
उस सिरे तक -
लिख देती
नाम तुम्हारे
जीवन की हर इक लहर !
पर एक ख्याल
भर रह गया
जेहन में ये मेरे -
समझ गई
अब इन
टूटते -टकराते -किनारों
से में कि
न इक
लकीर में
समाते हैं
सपने, और
न ही
कलम बनाती
है कोई ऐसी
लकीर !

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