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Showing posts from March, 2012

जिहाद के मायने धर्मयुद्व नहीं---अतुल चंद्र अवस्थी

तुम्हारे लिए जिहाद के मायने धर्मयुद्व है,

लेकिन धर्म की परिभाषा क्या जानते हो ।

जिसकी खातिर तुमने इंकलाब का नारा बुलंद किया,

तोरा बोरा की पहाडियों में खाक छानते रहे,

09/11 की रात अमेरिका को खून से नहलाया,

आतंक का ऐसा पर्याय बने कि,

यमराज को भी पसीना आया।

लेकिन क्या जिहाद की भाषा समझ सके;

जिस जिहाद की खातिर लाखों परिवारों की खुशियां छीनी।

मासूमों के हाथों में किताब की जगह एके 47 थमा दी।

गली मोहल्लों चौक चौराहों पर तुमने खेली खून की होली।

धरती माता के सीने को किया गोलियों से छलनी।

देश की धड़कन मुंबई को किया लहूलुहान।

लेकिन अंजाम क्या हुआ,

तुमने भोगा सारी दुनिया ने देखा।

जिस पर था तुम्हे नाज उन्होने ही मुंह मोड़ लिया।

कल तक जो तुम्हारे आतंकी इरादों को देते थे हवा।

उन्होने ही एबटाबाद में तुम्हारी मौजूदगी से किनारा कस लिया।

अंतिम समय में फिर धरती मां ही तुम्हारा सहारा बनी।

वही धरती मां जिसकी छाती पर तुमने पल-पल गोलियां बरसाई।

मां और बेटे के रिश्ते को जिंदा रहते कलंकित किया।

लेकिन अमेरिकी आपरेशन में तुम्हारी आंख बंद होने के बाद।

उसी धरती मां ने तुम्हे अपने लहूलुहान आंचल में सहेज लिया।

इसलिए क्यूंकि तुम भी उसके जिगर…

पीकर धुआं तुम जीतो हो किसके वास्ते---(दीपक शर्मा)

वैसे ही बहुत कम हैं उजालों के रास्ते,
फिर पीकर धुआं तुम जीतो हो किसके वास्ते,

माना जीना नहीं आसान इस मुश्किल दौर में
कश लेके नहीं निकलते खुशियों के रास्ते

जिन्नात नहीं अब मौत ही मिलती है रगड़ कर,
यूँ सूरती नहीं हाथों से रगड़ के फांकते ,

तेरी ज़िन्दगी के साथ जुडी कई और ज़िन्दगी,
मुकद्दर नहीं तिफ्लत के कभी लत में वारते ,

पी लूं जहाँ के दर्द खुदा कुछ ऐसा दे नशा ,
"दीपक" नहीं नशा कोई गाफिल से पालते ,

लकीर (कविता)---सुजाता सक्सेना

मैं
इक
लकीर
बनाती अगर
होती हाथ
मेरे कलम,
समां देती उसमे
अपने
सारे सपने
और आशाओं के महल !
इस सिरे से
उस सिरे तक -
लिख देती
नाम तुम्हारे
जीवन की हर इक लहर !
पर एक ख्याल
भर रह गया
जेहन में ये मेरे -
समझ गई
अब इन
टूटते -टकराते -किनारों
से में कि
न इक
लकीर में
समाते हैं
सपने, और
न ही
कलम बनाती
है कोई ऐसी
लकीर !

विनोबा का भूदान और आज का भारत----(कन्हैया त्रिपाठी)

गांधी के सच्चे लोगों में विनोबा भावे एक ऐसा नाम है जो वास्तव में गांधी जी के कार्यों को भली प्रकार उनकी मृत्यु के बाद आगे ले गए। विनोबा ने अपने समय के उन मूल्यों और आध्यात्मिक पहलुओं पर विचार किया जो किसी गांधीवादी और सच्चे समाज सेवक के लिए मिसाल है। उनके जीवन का सबसे उत्तम आन्दोलनों में पहले गांधी के रचनात्मक कार्य प्रमुख थे लेकिन वह जय जगत के वास्तविक स्वरूप को पाने के लिए भूदान आन्दोलन की ओर बढ़े।
उन्होंने 18 अप्रिल, 1958 को गांधी की मृत्यु के 10 वर्ष बाद इस आन्दोलन की शुरुआत तेलंगाना क्षेत्र के पोचमपल्ली गांव से की। भूदान का अर्थ है-भूमिहीनों के भूमि दरिद्रता को दूर करने की एक पहल। इसके अन्तर्गत वह जमींदारों के पास पड़ी पर्याप्त भूमि को वितरण के लिए सबके बीच आगे आए। इस तरह का एक आख्यान भारतीय वाड.मय में विद्यमान है। लेकिन उस दौरान भूमिदान का कार्य बामनावतार के अनभिज्ञता में किया गया था लेकिन इस युग में विनोबा ने जो भूमिदान के लिए लोगों को तैयार किया और तेलंगााना में इसकी शुरुआत की वह जानते बूझते लोगों के बीच हुआ।
उनके इस भूदान आन्दोलन को जनान्दोलन के रूप में हम सभी देखते हैं। जयप्रकाश…

कही दूर हमेशा-हमेशा के लिये---(कविता)---संगीता मोदी "शमा"

कही दूर हमेशा-हमेशा के लिये
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वो दूंड रही थी बेचेनी में ,

करुण क्रंदन के साथ,

वो चिड़िया ,

हाँ --------

वो चिड़िया ---

कल था उसका बसेरा जहाँ ,

आज ढेर था पड़ा बहाँ ,

सुबह सबेरे के उगते सूरज कि लालिमा ,

आसमान में किसी चित्रकार कि चित्रकारी का नमूना सी दिखाई देती थी जहाँ,

कोयल कि तान और

कौओ की कर्कश ध्वनि के साथ किसी के आने का सन्देश देती आवाज़ ,

अब सब लुप्त होती जा रही हें गिरती बिल्डिंग के साथ,

और वो प्यारा सा रंगीन पंखो बाला नीलकंठ !

जिसकी आवाज़ सुन बैचेन हो उटता था मन उसे देखने को ,

कभी-कभी दिखा करता था कबूतर का इक जोड़ा अक्सर

जो बरबस ही होंटों पर ले आता था मुस्कान

उनकी अठखेलियाँ --------------------

कभी कबूतरी को मनाता कबूतर

और कभी गर्व से सीना ताने कबूतरी पर हुकुम बजता सा प्रतीत होता था

आज

आज सब सूना हें

वीराना हें आज चारो तरफ,

बस दिखाई देते हें तो ,बेचेनी में अपना आशियाना दूंदते वो पंछी

अपने करुण क्रंदन के साथ

चले जायेंगे फिर कहीं हमेशा -हमेशा के लिए

दिन-दो-दिन इसी तरह बेचेनी में चक्कर लगाते ,

वापस कही दूर -----

और रह जाएँगी तो बस

दिल में मेरे ये यादे और हर वक्त नश्तर की तरह चुभ…

दिल को बहलाना सीख लिया {ग़ज़ल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

जबसे तेरी यादों में दिल को बहलाना सीख लिया
हमने मुहब्बत में खोकर भी पाना सीख लिया
जब धड़कन-२ भीगी गम से, सांसे भी चुभने लगी
दर्द की चिंगारी को बुझाने के लिए आंसू बहाना सीख लिया
तरसी-२ प्यासी-२ भटकती हैं मेरी नजरें इधर उधर
जबसे तेरी आँखों ने संयत अदा में शर्मना सीख लिया
जबसे तेरे शहर में, तेरे इश्क में बदनाम हम हुए
समझ गए ज़माने की अदा, दिल से दिल की बातें छुपाना सीख लिया
पन्नो में लिपटे, मुरझाए गुलाब की खुश्बू से सीखकर
हमने ज़िन्दगी में खुद लुटकर सबको हँसाना सीख लिया

वैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ है नागरी लिपि- जस्टिस जोइस

नई दिल्ली। ‘नागरी लिपि पूर्णतयः वैज्ञानिक एवं विश्व की सर्वश्रेष्ठ लिपि है। भारत की सभी भाषाओं की एक अतिरिक्त लिपि के रूप में यह राष्ट्रीय एकता का सेतूबंध है इसलिए मैंने संसद सदस्य के रूप में पेश अपे प्राईवेट बिल के द्वारा हर भारतीय नागरिक के लिए इसका प्रशिक्षण अनिवार्य करने का सुझाव दिया है।’ सांसद जस्टिस एम.रामा जोइस ने आजाद भवन में नागरी लिपि राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के पद से बोलते हुए संसद में विभिन्न स्थानों पर सुनहरी अक्षरों से नागरी लिपि में लिखे सद्वाक्यों की चर्चा भी की। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एवं नागरी लिपि परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस एक दिवसीय संगोष्ठी के अध्यक्ष सांसद डॉ. रामप्रकाश, विशिष्ट अतिथि पूर्व सांसद डॉ. रत्नाकर पाण्डेय, विशेष अतिथि लोकसभा चैनल के संपादक श्री ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, प्रवासी साहित्यकार डॉ. उषा राजे सक्सेना ने भी नागरी लिपि की जरूरत पर बल दिया। इससे पूर्व संस्था के महामंत्री डॉ. परमानंद डा. पांचाल ने आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित नागरी लिपि परिषद के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए नागरी को विश्वलिपि बनने के स…

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