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Showing posts from January, 2012

सम्वेदना ये कैसी?---(श्यामल सुमन)

सब जानते प्रभु तो है प्रार्थना ये कैसी?
किस्मत की बात सच तो नित साधना ये कैसी?

जितनी भी प्रार्थनाएं इक माँग-पत्र जैसा
यदि फर्ज को निभाते फिर वन्दना ये कैसी?

हम हैं तभी तो तुम हो रौनक तुम्हारे दर पे
चढ़ते हैं क्यों चढ़ावा नित कामना ये कैसी?

होती जहाँ पे पूजा हैं मैकदे भी रौशन
दोनों में इक सही तो अवमानना ये कैसी?

मरते हैं भूखे कितने कोई खा के मर रहा है
सब कुछ तुम्हारे वश में सम्वेदना ये कैसी?

बाजार और प्रभु का दरबार एक जैसा
बस खेल मुनाफे का दुर्भावना ये कैसी?

जहाँ प्रेम हो परस्पर क्यों डर से होती पूजा
संवाद सुमन उनसे सम्भावना ये कैसी?

मैं सपने देखता हूँ......ब्रजेश सिंह

मैं सपने देखता हूँ
हाँ मैं भी सपने देखता हूँ
कभी जागते हुए कभी सोते हुए
कभी पर्वतों से ऊंचे सपने
कभी गुलाब से हसीं सपने
कभी खुद को समझने के सपने
कभी खुद को जीतने के सपने
कभी खुद को हारने के सपने
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ
मैं हर रंग हर आकार हर हर स्वाद के सपने देखता हूँ
कभी नीले कभी गुलाबी कभी
कभी तीखे कभी मीठे
कभी छोटे कभी बड़े
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ

मेरे सपने बहूत जल्दी टूट टूटे हैं
और बिखर जाते हैं
मेरे सपने कांच की तरह होते हैं
एकदम साफ़ और पारदर्शी
दिख जाते है सबको मेरे सपने
मैं छिपाकर नहीं रख पाता इनको
इसलिए लोग खेलने लगते हैं इनसे
और टूट जाते हैं मेरे सपने खेल खेल में
मैं कोशिश करता हूँ इन्हें फिर से सजाने की
पर चुभ जाते हैं मेरे ही सपनो के महीन टूकड़े
और मैं दर्द से तड़पता रहता हूँ

मुझे अफ़सोस नहीं होता
जब ये सपने टूटते हैं
अब आदत हो गयी हैं इनके टूटने की
अब तो अधूरा सा लगता है
जब नहीं टूटता है कोई सपना
मन व्याकुल हो जाता है जब नहीं मिलता है सुनने को वो आवाज
जो पैदा होती है इनके टूटने पर

मैं हर वक़्त सपने देखता हूँ
मैं देखना चाहता हूँ उन चीजों को सपनो में

खुदा मेरा दोस्त था... कैस जौनपुरी

जब मैं नमाज नहीं पढ़ता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब भी कोई काम पड़ता था
लड़ता था झगड़ता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब भी परेशां होता था
मेरा काम बना देता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब से नमाज पढ़ने लगा हूँ
वो बड़ा आदमी हो गया है
उसका रुतबा बड़ा हो गया है
मुझसे दूर जा बैठा है
अब भी मेरी दुआएँ
होती हैं पूरी
लेकिन हो गई है
हम दोनों के बीच दूरी
वो बड़ा हो गया है
मैं छोटा हो गया हूँ
मैं सजदे में होता हूँ
वो रुतबे में होता है
पहले का दौर और था
जब मुश्किलों का ठौर था
बन आती थी जब जान पे
था पुकारता मैं तब उसे
अगर करे वो अनसुनी
था डांटता मैं तब उसे
कहता था जाओ खुश रहो
खुदा मेरा दोस्त था...
अब कि बात और है
वो हक बचा न दोस्ती

आधे घंटे में प्यार..!

फोन पर मैसेज आया, “तुझे कभी आठ घंटों में प्यार हुआ है?” प्रिया समझ गई फैसल को फिर किसी से प्यार हो गया है। उसने जवाब भेजा, “नहीं...पर जानती हूं तुझे हुआ है।”

प्रिया का मन फिर काम में नहीं लगा। जैसे-तैसे खानापूर्ति करके वो ऑफिस से जल्दी निकल तो आई लेकिन इतनी जल्दी घर जाने का न ही उसका मन था और न ही आदत। काफी देर बस स्टॉप पर खड़े रहने के बाद प्रिया को एक खाली बस आते हुए दिखाई दी। हालांकि वो बस उसके घर की तरफ नहीं जा रही थी लेकिन प्रिया को लगा जैसे ये बस सिर्फ उसी के लिए आई है। प्रिया बस में चढ़ गई और खाली सीटों में से अपनी पसंदीदा बैक सीट पर खिड़की के पास बैठ गई। फैसल और प्रिया कॉलेज के दिनों में अक्सर इसी तरह खाली बसों में शहर के चक्कर लगाया करते थे। टिकट की कोई चिंता ही नहीं रहती थी क्योंकि बैग के कोने में स्टूडेंट बस पास पड़ा होता था।

फोन फिर वाइब्रेट हुआ। इस बार मैसेज संदीप का था। संदीप प्रिया का कलीग था। ऑफिस से दोनों अक्सर साथ आते-जाते थे। प्रिया जानती थी संदीप उसे पसंद करता है लेकिन प्रिया जानकर अनजान बने रहना ही ठीक समझती थी। फैसल के जाने के बा उसने अपने आपको एक दायरे में सीमित …

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