Monday, November 7, 2011

माँ करती हूँ तुझे मै नमन---(कविता)----ज्योति चौहान



माँ करती हूँ, तुझे मै नमन
तेरी परविरश को करती हूँ नमन
प्यासे को मिलता जैसे पानी,
माँ तू है वो जिंदगानी ,
नो महीनो तक सींचा तूने
लाख परेशानी सही तूने ,
पर कभी ना तू हारी
धूप सही तूने और दी मुझे छाया
भगवान का रूप तू है दूजा
तेरे प्यार का मोल नही है कोई

तू मेरा हर दर्द महसूस करती
मीठी-मीठी लोरी गाती, सुबह बिस्तर से उठाती
टिफन बनाती, यूनिफोर्म तैयार करती
रोज मुझे स्कूल भेजती
मुझे क्या अच्छा लगता, तुझे था पता
तेरी हाथ की रोटी के बराबर, नही कुछ स्वादिष्ट दूजा
लाड प्यार से सदा सिखाया, तूने सच्चा ज्ञान

तू भोली, प्यारी न्यारी, मेरी माँ
तू सुखद क्षण की, एक फुहार
तू तपती आग मे नरम छाँव-सी
तुम मुश्किलो मे हमेशा राह दिखातीं
तुम मेरी खास प्रिय मीत सी
ऐ माँ करती हूँ , तुझे मै नमन

तेरे हर दर्द को महसूस मुझे अब करना
तेरे बुदापे का सहारा बनना
तेरी तपस्या को नही भूलना
तेरे हर ख्वाब को पूरा करना
तेरा मन नही दुखाना
तेरे आगे हर पल शीश झुकाना
तू मेरा जीवन
पाकर हुई तुझे मै धन्य

नही हैं शब्द करूँ कैसे तेरा धन्यवाद,
बस चाहिए तेरा आशीर्वाद,
ऐ माँ तेरा धन्यवाद!
करती हूँ तुझको शत-शत प्रणाम
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