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Showing posts from July, 2011

पर्दा प्रथा: विडंबना या कुछ और---------मिथिलेश दुबे

अपने देश में महिलाओं को (खासकर उत्तर भारत में ज्यादा) पर्दे में रखने का रिवाज है । इसके पीछे का कारण शायद ही कोई स्पष्ट कर पाये फिर भी ये सवाल तो कौंधता ही है कि आखिर क्यों ? मनुष्यों में समान होने के बावजूद भी महिलाओ‍ को ढककर या छिपाकर रखने के पीछे का क्या कारण हो सकता है ? ये सवाल हमारे समाज में अक्सर ही किया जाता रहा है, कुछ विद्वानों का मानना है कि पर्दा प्रथा समाज के लिये बहुत ही आवश्यक है इसके पीछे के कारण के बारे में उनका कहना है कि इस प्रथा से पुरूष कामुकता को वश में किया जा सकता है । लेकिन इस जवाब के संदर्भ में ये सवाल भी खड़ा होता है कि क्या पुरूष की कामुकता इतनी बढ़ गयी है कि उसे अपने ही समकक्ष महिला साथी को कैदियों की तरह रखना पड़ रहा है? तो क्या ये माना जाये कि पर्दा प्रथा से दूराचार रोका जा सकता है ? जहाँ तक मेरा मानना है कि ऐसा सोचना व्यर्थ ही होगा क्योंकि दुनियां में जितने भी गलत काम होते हैं वे चोरी छिपे ही होते हैं । तो इस परिपेक्ष्य में ऐसा सोचना मुर्खता मात्र ही होगा । तन ढकने या पर्दा करने से पुरूषों की या किसी अन्य की प्रवृत्ति या सोच पर अंकुश लगाया जा सकता है ? …

बेनूर चाँद {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

एक दर्द में फिर डूबी शमा, फिर चाँद हुआ बेनूर
बिखरा दिल, टीसती यादें तेरी भला क्यूँ हुए तुम दूर
करूँ वक़्त से शिकवा या फिर अफ़सोस अपनी किस्मत पर 
तरसती "प्यास" में तडपूं हर पल, ऐसा चढ़ा उस साकी का सुरूर 
ये कशिश है इश्क की या दीवानगी का कोई दिलकश सबब
तडपती जुदाई उसी को क्यूँ , जो होता प्यार में बेकसूर 
हजारों तारों के साथ भी आसमां क्यूँ हुआ तनहा
जब बंद हो गईं आंखे चकोर की, चाँद भी हो गया बेनूर 
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मन के अन्तरम में पता नहीं कैसी टीस कैसी बेचैनी उठी,
फिर न चाहते हुए/ न जानते हुए भी इन पंक्तियों को  क्यूँ  और कैसे
शब्दों में पिरोया मैंने, मै खुद नहीं  समझ सका  !

सांप्रदायिकता (कविता)----जयप्रकाश स‌िंह बंधु

स‌ब जानते हैं-
स‌ांप्रदायिकता!
धर्म,भाषा,रंग,देश...
न जाने कितनी ही बिंदुओं पर
तुम कटार उठाओगे
और दौड़ने लगोगे एकाएक
हांफते हुए-
कस्बा-कस्बा
शहर-शहर
गांव-गांव।

और यह भी
स‌ब जानते हैं-
कि अपने चरित्रानुसार
रोती-बिलखती बुत बनी आत्माओं
खंडहरों के बीच छुप जाओगे
शायद तुम्हारे भीतर का आदमी
डरा होगा थोड़ी देर के लिए।

तब-
उन्हीं खंडहरों
काठ बनी आत्माओं के बीच स‌े
निकल आएगा धीरे-धीरे
एक कस्बा
एक शहर
एक गांव....एक गांव...।

अरिमान (कविता)-----विजय कुमार शर्मा

१. अरिमान - एक

जो बिछुर रहें जग की चाल से
उन्हें रफ़्तार पे ला दूँ मैं
जो मचा रहें हो भीम उछल कूंद
उन्हें शांति का पाठ पढ़ा दूँ मैं
जो बढ़ रहें हो सरहदों से आगे
उन्हें सरहदों में रहना सिखा दूँ मैं
मेरे जीवन का एक तुष्य ख्वाब
जग में रामराज बना दूँ मैं

न चले गोंलिया न बहे खून
न कहीं कोई कैसा मातम हो
हर दर पे उमरे बस खुशी
हर घर उन्नति का पालक हो
चहचहाता आंगन हो सबका
हर कोई समृधि श्रष्टि का चालक हो
मेरे जीवन की एक बिसरी कल्पना
हो एक देव जो दैत्यों का घालक हो

२. अरिमान - दो

आये मेरे में इतना सामर्थ
बंजर में भी फसल उगा दूँ मैं
जो मुरझा रहे पंचतत्वो के वाहक
उन्हें अजेय झुझारू बना दूँ मैं
जो दहक रहा हो किसी का अन्तःपुर
उसे अतुल्य जल पिला दूँ मैं
जो उठी हो पावक किसी में डंसने की
अपने को ही जिला दूँ मैं

हो अगर देवयोग अभागिन बनाने का
जग से पूरा विश्वाश मिले
हर राहें अंशुओं की बंद मिले
हर राह पे नयी आस मिले
मिट जाये वैर शब्द शब्दकोश से
प्रेम का चहुदिशी उचास मिले
मेरी माटी के हर गावं में
अमावश्या में भी प्रकाश मिले

३. अरिमान - तीन

मैं चाह नहीं नरेश बनना
मेरी चाह नहीं धरा पे छा जाना
मेरी इक्षाएं है वेगानी मेरे से अब
जब कूटनीती…

हिंगलिश दोहे...................श्यामल सुमन

LIFEMISERABLE हुई, INCREASINGहै RATE।
GODOWN में GRAIN है, PEOPLEEMPTY पेट।।

JOURNEY हो जब TRAIN से, FEAR होता साथ।
होगा ACCIDENT कब, मिले DEATH से हाथ।।

इक LEADERSPEECH का, दूजा करे OPPOSE।
दिखती UNITY जहाँ, PAY से अधिक PRAPOSE।।

आज CORRUPTION के प्रति, कही न दिखती HATE।
जो भी हैं WANTED यहाँ, खुला MINISTERGATE।।

आँखों में TEAR नहीं, नहीं TIME पे RAIN।
सुमन की LIFESAFE है, LOSS कहें या GAIN।।

मोहब्बत.............रमन कुमार अग्रवाल'रम्मन'

परिंदा क़ैद में है
आशियाना देखता है

परिंदा क़ैद में है
आशियाना देखता है

वो बंद आँखों से
सपना सुहाना देखता है

तू ही समझ न सका अहमियत मोहब्बत
की

तेरे तरफ तो ये
सारा ज़माना देखता है

तू ही तबीब, तू ही रहनुमा तू
ही रहबर

तेरे करम
को तो सारा ज़माना देखता है

तू आशिकों का है आशिक़, ये शान है
तेरी

तेरी मिसाल तू खुद है
ज़माना देखता है

नवाज़ देना तू 'रम्मन'
को भी मोहब्बत से

दीवाना मिलने का तेरे
बहाना देखता है

चवन्नी का अवसान : चवनिया मुस्कान--------श्यामल सुमन

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सच तो ये है कि चवन्नी से परिचय बहुत पहले हुआ और"चवनिया मुस्कान" से बहुत बाद में। आज जब याद करता हूँ अपने बचपन को तो याद आती है वो खुशी, जब गाँव का मेला देखने के लिए घर में किसी बड़े के हाथ से एक चवन्नी हथेली पर रख दिया जाता था "ऐश" करने के लिए। सचमुच मन बहुत खुश होता था और चेहरे पर स्वाभाविक चवनिया मुस्कान आ जाती थी। हालाकि बाद में चवनिया मुस्कान का मतलब भी समझा। मैं क्या पूरे समाज ने समझा। मगर उस एक दो चवन्नी का स्वामी बनते ही जो खुशी और"बादशाहत" महसूस होती थी, वो तो आज हजारों पाकर भी नहीं महसूस कर पाता हूँ।

15 अगस्त 1950 से भारत में सिक्कों का चलन शुरू हुआ। उन दिनों "आना" का चलन था आम जीवन में। आना अर्थात छः पैसा और सोलह आने का एक रूपया। फिर बाजार और आम आदमी की सुविधा के लिए 1957 में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया यानि रूपये को पैसा में बदल कर। अर्थात एक रूपया बराबर 100 पैसा और 25 पैसा का सिक्का चवन्नी के नाम से मशहूर हो गया।

भले ही 1957 में यह बदलाव हुआ हो लेकिन व्यवहार में बहुत बर्षों बाद तक हमलोग आना और पैसा का मेल कराते रहते थे। यदि 6 पैसे का …

सरकार भी संसद से ऊपर नहीं - शम्भु चौधरी

भारत जब से आज़ाद हुआ इसके आज़ादी के मायने ही बदल गये। सांप्रदायिकता के नये-नये अर्थ शब्द कोश में भरने लगे। इसका सबसे ताजा उदाहरण है भ्रष्टाचार की बात करने वाले भी अब सांप्रदायिक तकतों से हाथ मिला लिये। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के लिए लाला कारपेट बिछाने वाली कांग्रेस को अचानक से एक ही दिन में सांप्रदायिक नजर आने लगे। अब अन्ना हजारे पर भी आरोप मढ़ दिया कि वे भ्रष्टाचार की लड़ाई में सांप्रदायिक ताकतों को साथ लेकर सरकार से लड़ाई कर रहे हैं। जब तक कांग्रेसियों का मन होगा और आप उनकी बात मानते रहेगें वो धर्मनिरपेक्ष नहीं तो सांप्रदायिक।इस लेख को पढ़ने से पहले हम इस बात पर बहस शुरु करें कि हमें बात किस विषय पर करनी है? हमारी बातों का मुख्य मुद्दा क्या है? भ्रष्टाचार है कि सांप्रदायिकता।सरकार जो जन लोकपाल बिल संसद के सदन में रखने जा रही है उसमें किन-किन बातों का उल्लेख सरकार करना चाहती है और कौन से मुद्दे को वो अलोकतांत्रिक मानती है? और किसे लोकतांत्रिक।सरकार के जो बयान हमें पढ़ने और सुनने को मिल रहें हैं वे न सिर्फ तानाशाही बयान है बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दे की उन सभी बातों को सांप्रदायिकता क…