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Showing posts from June, 2011

अंडमान में 'सरस्वती सुमन' के लघु कथा विशेषांक का लोकार्पण और ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी

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अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन'…

व्यंग्यः कांग्रेसी दांत - शम्भु चौधरी

जिस शख्स ने भी इस कहावत को ‘‘हाथी के दांत दिखने के और खाने के और’’लिखा, शायद उसे पता भी नहीं होगा कि भारत में एक राजनैतिक दल जिसका नाम कांग्रेस पार्टी है उसके लिए भी इस कहावत को लागू कर दिया जायेगा। जब से कांग्रेस जोंकपाल बनाम लोकपाल बिल बनाने के कसरत में लगी है कांग्रेस पार्टी नये-नये शब्दों का गठन कर कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव पर हमला कर रही है तो कभी खुद का बचाव करने में। अब कांग्रेसियों ने दावा किया है कि पिछले 6 माह में इन लोगों ने 68 हजार करोड़ काले धन को सफेद बना दिया है। कांग्रेसीगण इस बात का जबाब हमें शायद नहीं देगी कारण की ‘‘हमरी कलमवा किसी भी चुनावी मैदान से चुन कर पैदा नहीं हुई। साली भ्रष्टाचार के काले कमाई से पैदा होल’वाणी। अब ईंमे हमनी’के का दोष बाड़े? सारे देसवां में’ईं ईईई... धनवा सूरा आआअ...साळा चलते-चलते काला हो गईंल’बां। ऐई..में कांग्रेसियां लोगण’का का दोष देवे का कोणु बात नैईखे बां।’’अब लो भाई बंगाल में रह कर हमारी कलम भी माकपा की तरह गरीबों की मसीहा बन गई। दिते हुबे...दिते हुबे- पुरिये देबो...पुरिये दिबो... करते-करते किसानों की जमीन ही डकारने लगी। एई तो मम…

मुस्कानों में जहर को देखा.............श्यामल सुमन

घर के ऊपर घर को देखा
और भागते शहर को देखा

किसे होश है एक दूजे की
मजलूमों पे कहर को देखा

तोता भी है मैना भी है
मगर प्यार में कसर को देखा

हाथ मिलाते लोगों के भी
मुस्कानों में जहर को देखा

चकाचौंध है अंधियारे में
थकी थकी सी सहर को देखा

एक से एक भक्त लक्ष्मी के
कोमलता पे असर को देखा

पानी को अब खेत तरसते
शहर बीच में नहर को देखा

बढ़ता जंगल कंकरीट का
जहाँ सिसकते शजर को देखा

यहाँ काफिया यह रदीफ है
सुमन तो केवल बहर को देखा

मगर आँख में नीर है........................श्यामल सुमन

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कंचन चमक शरीर है
मगर आँख में नीर है

जिसकी चाहत वही दूर में
कैसी यह तकदीर है

मिल न पाते मिलकर के भी
किया लाख तदबीर है

लोक लाज की मजबूती से
हाथों में जंजीर है

दिल की बातें कहना मुश्किल
परम्परा शमसीर है

प्रेम परस्पर न हो दिल में
व्यर्थ सभी तकरीर है

पी कर दर्द खुशी चेहरे पर
यही सुमन तस्वीर है

मैं हूँ पेड़.........सामाजिक कार्यकर्त्री दिव्या संजय जैन

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मैं हूँ पेड़।
नीम,बबुल,आम,बड़,पीपल,
सागवान,सीसम और चन्दन का पेड़।
मैं हूँ पेड़।
मैं तुम्हें सब कुछ देता।
फूल देता,फल देता।
सूखने के बाद लकडी देता।
और जो है सबसे आवष्यक कहलाती है
जो प्राणवायु,ऐसी ऑक्सीजन वो भी मैं ही तुम्हें देता।
मैं हूँ पेड़।
मैं तुम्हें सब कुछ देता।
बदले में तुमसे क्या लेता,कुछ भी तो नहीं लेता।
और तुम मुझे क्या देते ? बताओ तो जरा
हाँ लेकिन तुम
काटते हो मेरी टहनियाँ,मेरी शाखाएँ,मेरा तना
मुझे लंगडा व लूला बनाते हो।
मैं हूँ पेड़।
मैं तुम्हें सब कुछ देता।
तुम रूठ जाओ तो क्या होगा नुकसान ?
कुछ भी नहीं फिर भी तुम्हें मनाती हैं माँ और बहन
मैं रूठ जाऊँ तो क्या होगा ? कौन मनाएगा मुझे
और मैं नहीं माना तो !
आक्सीजन कौन देगा तुम्हें
वर्षा भी नहीं होगी,पानी नहीं मिलेगा
सूर्य के प्रकोप से कौन बचाएगा
पथिक को विश्राम कहा मिलेगा।
तुम्हें फल,फूल,दवा और लकड़ी कौन देगा।
सोचा है तुमने कभी ?
मैं हूँ पेड़।
मैं तुम्हें सब कुछ देता।
मैने देखा है आप मुझे लगाने के नाम पर रेकार्ड बनाते है।
लगाते दस और बताते सौ है
और चल पाते है उनमें से भी मात्र कुछ पेड़
बताओ मुझे
तुमने जो पेड़-पौधे लगाए
उनको पानी कितनी बार दिया।
कितनों की सुरक…

पर्यावरण दिवश {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

आओ सब मिल जुल कर

एक संकल्प में बंध जाएं

वृक्षारोपण कर पर्यावरण  दिवस मनाएं

इस धरा पुन: वसुंधरा बनाएं

शुद्ध, वायु से शुद्ध, जल से

शुद्ध मृदा से पर्यावरण को सजाएं

इस दिन को कभी न  भूलें

कदम कदम पर वृक्ष लगा कर

हर दिन "पर्यावरण  दिवस" मनाएं

मृदा, वायु, जल को , कर प्रयास

अमृतमय बनाएं

सब मिल जुल कर एक ही गीत गाएं

पर केवल गीत न गाएं

निज प्रयास से, इस संकल्प को सार्थक बनाएं

आओ सब मिल जुल कर

एक संकल्प में बंध जाएं

वृक्षारोपण कर पर्यावरण  दिवस मनाएं...

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