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Showing posts from May, 2011

कविता..................@दीपक शर्मा

वैसे ही बहुत कम हैं उजालों के रास्ते,
फिर पीकर धुआं तुम जीतो हो किसके वास्ते,

माना जीना नहीं आसान इस मुश्किल दौर में
कश लेके नहीं निकलते खुशियों के रास्ते

जिन्नात नहीं अब मौत ही मिलती है रगड़ कर,
यूँ सूरती नहीं हाथों से रगड़ के फांकते ,

तेरी ज़िन्दगी के साथ जुडी कई और ज़िन्दगी,
मुकद्दर नहीं तिफ्लत के कभी लत में वारते ,

पी लूं जहाँ के दर्द खुदा कुछ ऐसा दे नशा ,
"दीपक" नहीं नशा कोई गाफिल से पालते ,


विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर कवि दीपक शर्मा द्वारा रचित रचना

जीवन इक विश्वास है.............श्यामल सुमन

जीवन इक विश्वास हैखुला हुआ आकाश है

वक्त आजतक उसने जीता
जिसने किया प्रयास है

कैसे कैसे लोग जगत में
अलग सभी की प्यास है

कुछ ही घर में रौनक यारों
चहुँ ओर संत्रास है

जहाँ पे देते शिक्षा दिन में
रात पशु आवास है

राजनीति और अपराधी का
क्या सुन्दर सहवास है

सहनशीलता अपनी ऐसी
नेताओं से आस है

लेकिन ये ना बदलेंगे अब
दशकों का अभ्यास है

यही समय है परिवर्तन का
सुमन हृदय आभास है

सुहानी साँझ {गीत} सन्तोष कुमार "प्यासा"

प्रखर होने लगी हिय उत्कंठा
आलोकित हुई सुप्त उमंग
तट पर लहरें खेले जैसे
मन में उठे वही तरंग
रोम-रोम हुआ स्पंदित
महक उठी तरुनाई
फिर सुहानी साँझ आई
उठी मचल स्म्रतियां फिर से
बज उठे ह्रदय के तार-तार
ये प्रीत धुन छेड़ी किसने
सजीव हो उठे आसार
विस्तृत होने लगी सुवासित सुरभि
मन में ये किसकी, धुंधली
छवि सी छाई
फिर सुहानी साँझ आई
बस एक आस लिए मै, काटूं पल-पल
प्रतीक्षा का यह अनंत काल घोर
विस्मृत भी कर सकता कैसे?
तुम चाँद तो मै चकोर
बह चली अश्रु सरित, होंठो में घुला विषाद
धरा में मनोरम मौन-वीणा छाई
फिर सुहानी साँझ आई...




कशिश {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

उसके पंजों में महज
 एक तिनका नहीं है,
और न ही उसकी चोंच में
एक चावल का दाना
वो तो पंजो में साधे
हुए है एक
सम्पूर्ण संसार,
उसकी चोंच में है
 एक कर्तब्य
एक स्नेहिल दुलार...
ये पर्वत शिखा से
निर्झरिणी का प्रवाह
महज एक
वैज्ञानिक कारण नहीं है,
और न ही
कोई संयोग,
ये तो धरा की तड़प,
और जीवन की प्यास
करती है इसे
पर्वताम्बर, से
उतरने को बेकल...
ये खिलती कलियाँ,
निखरती सुरप्रभा
सरकती,महकती
यूँ ही नहीं
मन को हर्षाते
संध्या की मौन वीणा
मचलती चांदनी
यूँ ही नहीं
प्रेमीयुगल की
उत्कंठा बढ़ाते...
ये बदलो के उस छोर
नित्य सूर्य का उगना, ढलना
महज एक प्राकृतिक नियम नहीं है,
ये सब तो
उर की उत्कंठा,
अनुरक्ति की देन है...
ये अलौकिक शक्ति है
प्रीत की,
एक मनोरम अभिव्यक्ति है
मिलन के रीत की....

बाल श्रम.................डॉ कीर्तिवर्धन

मैं खुद प्यासा रहता हूँ पर
जन-जन कि प्यास बुझाता हूँ
बालश्रम का मतलब क्या है
समझ नहीं मैं पाता हूँ|

भूखी अम्मा, भूखी दादी
भूखा मैं भी रहता हूँ
पानी बेचूं,प्यास बुझाऊं
शाम को रोटी खाता हूँ|

उनसे तो मैं ही अच्छा हूँ
जो भिक्षा माँगा करते हैं
नहीं गया विद्यालय तो क्या
मेहनत कि रोटी खाता हूँ|

पढ़ लिख कर बन जाऊं नेता
झूठे वादे दे लूँ धोखा
अच्छा इससे अनपढ़ रहना
मानव बनना होगा चोखा|

मानवता कि राह चलूँगा
खुशियों के दीप जलाऊंगा
प्यासा खुद रह जाऊँगा,पर
जन जन कि प्यास बुझाऊंगा|

जो वो आ जाए एक बार ***** {कविता} ***** सन्तोष कुमार "प्यासा"

इस कविता को मैंने "महादेवी वर्मा" की कविता "जो तुम आ जाते एक बार" से, प्रेरित होकर लिखा है

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घनीभूत पीड़ा में ह्रदय डूबा

अश्रुओं संग बह रहा विषाद

जल बिन मीन तडपे जैसे

तडपाए, प्रेम उन्माद

फिर सजीव हो जाए आसार

जो वो आ जाएं एक बार

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उसे पाने की बढ़ी लालसा ऐसी

पल पल होती चाहत प्रखर

ह्रदय के कोरे पृष्ठों में

लिख दो आकर, प्रिताक्षर

मेरे मन के उपवन में छा जाए बहार

जो वो आ जाएं एक बार

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अलि कलि पर जब मंडराए

नभ पर विचरें जब विहंग

खो जाऊं आलिंगन में उसकी

मन में उठे ऐसी तरंग

बज उठें ह्रदय के तार तार

जो वो आ जाएं एक बार

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मेरे मस्तिष्क के हर कोने में छाई

उसके स्मृति की सुवासित सुरभि

अब न रुके आवेग अनुरक्ति का

समय, काल, अंतराल बताए

प्रीत न दाबे दबी

एक बने जीवन का आधार

जो वो आ जाएं एक बार

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"सूरज आया"......................ललित कर्मा

सबको राम राम, वह सुबह बहुत मासूम थी जब मै जागा बिलकुल नन्हे शिशु सी | प्रारंभ बच्चो को सिखाने के तरीके से हुई और फिर दोपहर, शाम, रात तक आगे बढ़ी और फिर अंत से शुरुआत की ओर चली .... हर रात के बाद सुबह होती है ...

"सूरज आया" कौन आया? सूरज आया, क्या लाया? उजाला लाया|१|
-- उठो, उठो, भोर हुई, जल्दी करो, रात गई|२|
-- मुह हाथ धोओ, पेट साफ करो, ठंडा/कुनकुना नहाओ, और ईश का ध्यान करो|३|
-- खाना खाओ, खाली पेट न यूँ घुमो, फिर अपने काम लगो, लगन से उसमे रामो|४|
-- घर आओ, अब दिन ढला, नीड़ हमारा है, सबसे भला|५|
-- दीप-बाती आओ जला ले, ईश वंदना करें, हे प्रभु,हे कृपालु, तू संताप हरे|६|
-- भूख लगी, अब खाना खाए, धन्यवाद कर, प्रभु के गुण गए|७|
-- राम भला हो, अब नीद सताएं, सुंदर सपनों में, अब खो जाये|८|


http://202.29.214.212/phpinfo.php?a%5B%5

आँख का पानी ...........डॉ कीर्तिवर्धन

होने लगा है कम अब आँख का पानी,
छलकता नहीं है अब आँख का पानी|
कम हो गया लिहाज,बुजुर्गों का जब से,
मरने लगा है अब आँख का पानी|
सिमटने लगे हैं जब से नदी,ताल,सरोवर
सूख गया है तब से आँख का पानी|
पर पीड़ा मे बहता था दरिया तूफानी
आता नहीं नजर कतरा ,आँख का पानी|
स्वार्थों कि चर्बी जब आँखों पर छाई
भूल गया बहना,आँख का पानी|

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साँझ और किनारा {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

ढलता सूरज, सुहानी साँझ और सागर का किनारा
पागल हवा ने किया जब दिलकश  इशारा
उसके तसव्वुर में, मैं खो सा गया
तन्हाई में एक आरजू जगी ऐसी
न जाने कब मै किसी का हो सा गया
सूरज की लालिमा फिर पानी में घुलने लगी
उल्फत की बंदिशें फिर खुलने लगी
दिल की अंजुमन फिर जमने लगी
धड़कने तेज हुईं, सांसे थमने लगी
जब उसके बाँहों का हर मुझे मयस्सर हुआ
पा गया मैं दुनिया की सारी ख़ुशी,

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माँ तुम्हें प्रणाम !.....................रेखा श्रीवास्तव, श्यामल सुमन

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हमको जन्म देने वाली माँ और फिर जीवनसाथी के साथ मिलनेवाली दूसरी माँ दोनों ही सम्मानीय हैं। दोनों का ही हमारेजीवन मेंमहत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इस मदर्स डे पर 'अम्मा' नहीं है - पिछली बार मदर्स डे पर उनकेकहे बगैर ही ऑफिस जाने से पहले उनकी पसंदीदाडिश बना कर दीतो बोली आज क्या है? शतायु होने कि तरफ उनके बड़ते कदमों नेश्रवण शक्ति छीन ली थी।इशारेसे ही बात कर लेते थे। रोज तो उनकोजो नाश्ता बनाया वही दे दिया और चल दिए ऑफिस।
वे अपनी बहुओं के लिए सही अर्थों में माँ बनी। उनके बेटे काफी उम्रमें हुए तो आँखों के तारे थे और जब बहुएँ आयींतो वे बेटियाँ होगयीं। अगर हम उन्हें माँ न कहें तो हमारी कृतघ्नता होगी। वे दोनोंबहुओं को बेटी ही मानती थीं।
मैं अपने जीवन की बात करती हूँ। जब मेरी बड़ी बेटी हुई तभी मेराबी एड में एडमिशन हो गया। मेरा घरऔरकॉलेज में बहुत दूरी थी ।६-८ घंटे लग जाते थे। कुछ दिन तो गयी लेकिन यह संभव नहीं होपा रहा था। कालेज केपास घर देखा लेकिन मिलना मुश्किल था।किसी तरह से एक कमरा और बरामदे का घर मिला जिसमें नखिड़कीथी और न रोशनदान लेकिन मरता क्या न करता? मेरीअम्मा ने विश्वविद्यालय की सारी सु…