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मैं सपने देखता हूँ......ब्रजेश सिंह

>> सोमवार, 23 जनवरी 2012

मैं सपने देखता हूँ
हाँ मैं भी सपने देखता हूँ
कभी जागते हुए कभी सोते हुए
कभी पर्वतों से ऊंचे सपने
कभी गुलाब से हसीं सपने
कभी खुद को समझने के सपने
कभी खुद को जीतने के सपने
कभी खुद को हारने के सपने
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ
मैं हर रंग हर आकार हर हर स्वाद के सपने देखता हूँ
कभी नीले कभी गुलाबी कभी
कभी तीखे कभी मीठे
कभी छोटे कभी बड़े
मैं हर तरह के सपने देखता हूँ

मेरे सपने बहूत जल्दी टूट टूटे हैं
और बिखर जाते हैं
मेरे सपने कांच की तरह होते हैं
एकदम साफ़ और पारदर्शी
दिख जाते है सबको मेरे सपने
मैं छिपाकर नहीं रख पाता इनको
इसलिए लोग खेलने लगते हैं इनसे
और टूट जाते हैं मेरे सपने खेल खेल में
मैं कोशिश करता हूँ इन्हें फिर से सजाने की
पर चुभ जाते हैं मेरे ही सपनो के महीन टूकड़े
और मैं दर्द से तड़पता रहता हूँ

मुझे अफ़सोस नहीं होता
जब ये सपने टूटते हैं
अब आदत हो गयी हैं इनके टूटने की
अब तो अधूरा सा लगता है
जब नहीं टूटता है कोई सपना
मन व्याकुल हो जाता है जब नहीं मिलता है सुनने को वो आवाज
जो पैदा होती है इनके टूटने पर

मैं हर वक़्त सपने देखता हूँ
मैं देखना चाहता हूँ उन चीजों को सपनो में
जिन्हें मैं हकीकत में चाह कर भी नहीं देख सकता

मैं सपनो में तितलियों को देखता हूँ
रंग बिरंगी, अनगिनत तितलियों को
पता नहीं कहाँ से आती हैं ये तितलियाँ
और फिर भरने लगती है रंग मेरी कोरी ज़िन्दगी में
पर अचानक! एक एक कर मरने लगती हैं ये तितलियाँ
और दब जाती हैं मेरी ज़िन्दगी इनकी लाशों तले
और टूट जाता है मेरा सपना रंगों का
ज़िन्दगी रह जाती है यूँ हीं श्वेत श्याम

मैं देखता हूँ सपनों में खुद को
एक निर्जन टापू पर
बेतहाशा दौड़ते हुए
कुछ ढूंढते हुए
मुझे दिखाई देता है सपने में
मेरा झून्झालाया सा चेहरा
मुझे दिखाई देती है एक प्यास मेरी आँखों में
तभी दिखता है दूर मुझे एक जहाज
और मैं चिल्लाता हूँ
खुश हो जाता हूँ की
आ रहा है एक जहाज
जो मुझे ले जाएगा मुझे अपने घर तक
लेकिन डूब जाता है ये जहाज
मेरे पास पहुँचने से पहले
और एक चीख के साथ टूट जाता है मेरा सपना

इसी तरह क्रम जारी है सपने सजाने का
और टूटने का
लेकिन मैं सजाता रहूँगा सपने
और पूरा भी करूंगा
क्यूंकि अभी तक किसी सपने में
दबी है मेरी ज़िन्दगी
उन तितलियों के लाशों तले
रंग भरना है ज़िन्दगी में
इसलिए मैं सपने देखूंगा
मैं देखूंगा सपने
और पूरा भी करूंगा
क्यूंकि मैं अबतक भटक रहा हूँ
उसी निर्जन टापू पर
एक जहाज के इंतज़ार में
मुझे पहुंचना है घर तक
मुझे करना है है सपना

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय 23 जनवरी 2012 8:58 am  

सपने अपने पूरे होंगे..बहुत ही सुन्दर..

परमजीत सिँह बाली 23 जनवरी 2012 2:04 pm  

bahut sundar rachanaa hai|

आपका आना अच्छा लगता है

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