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गर चाहते हो ...........(कविता)...........संगीता स्वरुप

>> शुक्रवार, 21 मई 2010

दिया तो
जला लिया है
हमने ज्ञान का
पर आँख में
मोतियाबिंद
लिए बैठे हैं .
रोशनी की कोई
महत्ता नहीं
जब मन में अन्धकार
किये बैठे हैं .

आचार है हमारे पास
पर
व्यवहार की कमी है
चाहते हैं पाना
बहुत कुछ
पर हम मुट्ठी
बंद किये बैठे हैं .

चाहते हैं
सिमट जाये
हथेलियों में
सारा जहाँ
जबकि
हम खुद ही
कर - कलम
किये बैठे हैं .

चाहते हैं पाना
नेह की
सुखद अनुभूति
लेकिन
हृदय - पटल
बंद किये बैठे हैं ..

गर चाहते हो कि
ऐसा सब हो
तो --
खोल दो
सारे किवाड़
आने दो एक
शीतल मंद बयार
मन - आँगन
बुहार दो
नयन खोल
दिए में
तेल डाल दो
मोतियाबिंद
हटा दो
हृदय के पट खोलो
प्रेम को बांटो
बाहें फैलाओ
और जहाँ को समेट लो .....



******************************

10 comments:

हिन्दी साहित्य मंच 21 मई 2010 5:36 pm  

बहुत ही सुन्दर रचना ....बधाई ..

neeshoo 21 मई 2010 5:37 pm  

चाहते हैं पाना
नेह की
सुखद अनुभूति
लेकिन
हृदय - पटल
बंद किये बैठे हैं ..
bahut hi aachi lagi kavita ...aabhar

faij 21 मई 2010 5:38 pm  

kya baat hai ..wakai humko manshikta ko badalna hoga ..prerna deti rachna

जय हिन्दू जय भारत 21 मई 2010 5:40 pm  

shaandaar prastuti aapki sangeeta ji ..tariph ko shabd nahi mil rahe hai .....bahut bahut badhai

M VERMA 21 मई 2010 6:31 pm  

हृदय के पट खोलो
प्रेम को बांटो
बाहें फैलाओ
और जहाँ को समेट लो .....
सुन्दर आह्वान और कविता

Udan Tashtari 21 मई 2010 9:10 pm  

रचना अच्छी लगी!!

मनोज कुमार 21 मई 2010 9:58 pm  

बहुत ही सुन्दर रचना ....बधाई ..

रावेंद्रकुमार रवि 21 मई 2010 11:55 pm  

यह कविता बहुत बढ़िया ढंग से शुरू होती है!
--
अंत बहुत प्रभावशाली है -
--
हृदय के पट खोलो,
प्रेम को बाँटो,
बाहें फैलाओ
और
जहाँ को समेट लो .....
--
हम भी उड़ते
हँसी का टुकड़ा पाने को,
क्योंकि इंद्रधनुष के सात रंग मुस्काए!

sangeeta swarup 22 मई 2010 11:48 am  

सभी पाठक बंधुओं का आभार

वन्दना 22 मई 2010 11:52 am  

bahut sundar prastuti.

आपका आना अच्छा लगता है

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