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एक कोशिश ......(कविता).............. संगीता स्वरुप

>> शुक्रवार, 14 मई 2010


रात की स्याही जब
चारों ओर फैलती है
गुनाहों के कीड़े ख़ुद -ब -ख़ुद
बाहर निकल आते हैं

चीर कर सन्नाटा 
रात के अंधेरे का
एक के बाद एक ये
गुनाह करते चले जाते हैं।

इनको न ज़िन्दगी से प्यार है
और न गुनाहों से है दुश्मनी 
ज़िन्दगी का क्या मकसद है 
ये भी नही पहचानते हैं।

रास्ता एक पकड़ लिया है 
जैसे बस अपराध का 
उस पर बिना सोचे ही 
बढ़ते चले जाते हैं।

कभी कोई उन्हें 
सही राह तो दिखाए 
ये तो अपनी ज़िन्दगी 
बरबाद किए जाते हैं।

चाँद की चाँदनी में 
ज्यों दीखता है बिल्कुल साफ़ 
चलो उनकी ज़िन्दगी में 
कुछ चाँदनी बिखेर आते हैं।

कोशिश हो सकती है 
शायद हमारी कामयाब 
स्याह रातों से उन्हें हम
उजेरे में ले आते हैं ।

एक बार रोशनी गर 
उनकी ज़िन्दगी में छा गई 
तो गुनाहों की किताब को 
बस दफ़न कर आते हैं 

******************

20 comments:

हिन्दी साहित्य मंच 14 मई 2010 5:52 pm  

संगीता जी प्रेरणा देती हुई कविता ...सरल शब्दों में ...बहुत बहुत हार्दिक बधाई

neeshoo 14 मई 2010 5:54 pm  

bahut hi sundar kavita lagi ..samaj me aise logo ko sahi karne ki sikh deti rchna ...dhanyavaad

जय हिन्दू जय भारत 14 मई 2010 5:56 pm  

aap hamesha hi bahut accha likhti hai ...iss baar bhi accha prayas kiya ..pasand aaya ..aabhar

faij 14 मई 2010 5:58 pm  

bahut acchi lagi kavita ..aisi hi soch ki jarurat hai ..aaj

shikha varshney 14 मई 2010 6:10 pm  

bahut sundar or saarthak kavita

दीपक 'मशाल' 14 मई 2010 6:31 pm  

बेहद खूबसूरत रचना निकली मैम आपकी कलम से एक बार फिर..

कविता रावत 14 मई 2010 6:58 pm  

एक बार रोशनी गर
उनकी ज़िन्दगी में छा गई
तो गुनाहों की किताब को
बस दफ़न कर आते हैं
...prabhavshali rachna..
bahut dhanyavaad.....

रश्मि प्रभा... 14 मई 2010 8:59 pm  

bahut hi shaandaar rachna sangeeta ji

महाशक्ति 14 मई 2010 9:34 pm  

badiya kavita

अनामिका की सदाये...... 14 मई 2010 10:39 pm  

कोशिश हो सकती है
शायद हमारी कामयाब
स्याह रातों से उन्हें हम
उजेरे में ले आते हैं ।

koshishe kaamyaab hoti hai...

chalo aaj ek koshish ham bhi karte hai...
kisi bhramit yuva ki syah raah ki roshni ham bhi bante hai...

bhahut acchhi sandesh deti hui rachna. badhayi.

Taru 14 मई 2010 10:42 pm  

एक बार रोशनी गर
उनकी ज़िन्दगी में छा गई
तो गुनाहों की किताब को
बस दफ़न कर आते हैं

bahut bahut achchi kavita Mumma.......woh line yaad aayi ''paap se ghrina karo paapi se nahin''.............:):)

रावेंद्रकुमार रवि 14 मई 2010 11:55 pm  

जितनी अच्छी शुरूआत, उतना ही अच्छा अंत!

अजय कुमार झा 15 मई 2010 8:39 am  

कोशिश अच्छी की है आपने , शुभकामनाएं । प्रयास जारी रहे । कविता के भाव सुंदर बन पडे हैं , आभार ,अभी निखार की बहुत गुंजाईश छोडी हुई है आपने , उम्मीद है कि भविष्य में बहुत कुछ पढने गुनने को मिलने वाला है ।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 15 मई 2010 10:18 am  

mumma..ye nazm pahle bhi padhi hai maine...sachmuch agar sahi rasta dikhaya jaye to kai andheron ko ujala mil jaye.. sarthak nazm hai mumma.. :)

अजय कुमार 15 मई 2010 10:29 am  

सार्थक रचना ।जायज चिंता ।

वन्दना 15 मई 2010 11:16 am  

बहुत ही सटीक रचना………………समाज को जागृति की नयी दिशा देती रचना………………सार्थक लेखन्।

sangeeta swarup 16 मई 2010 8:21 pm  

आप सभी पाठकों का हृदय से धन्यवाद...आपकी टिप्पणी प्रेरणास्रोत होती हैं..आभार

निर्झर'नीर 17 मई 2010 9:45 am  

रात की स्याही जब
चारों ओर फैलती है
गुनाहों के कीड़े ख़ुद -ब -ख़ुद
बाहर निकल आते हैं

nice lines...samaj ko nai raah dikhane ki ek behtar koshish hai aapki ,

sarhak bhaav hai kavita m

डा. श्याम गुप्त 19 मई 2010 7:29 pm  

कोशिश हो सकती है
शायद हमारी कामयाब
स्याह रातों से उन्हें हम
उजेरे में ले आते हैं ।-----कोशिश करना ही व्यक्ति का धर्म है---लाज़बाव .

बेनामी 11 सितम्बर 2010 6:34 pm  

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