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राहों के रंग-------[ ग़ज़ल]--------डाo श्याम गुप्त

>> रविवार, 14 मार्च 2010

राहों के रंग न जी सके कोई ज़िंदगी नहीं|
यूहीं चलते जाना दोस्त कोई ज़िंदगी नहीं |

कुछ पल तो रुक के देख ले,क्या क्या है राह में ,
यूही राह चलते जाना, कोई ज़िंदगी नहीं।

चलने का कुछ तो अर्थ हो कोई मुकाम हो,
चलने के लिए चलना कोई ज़िंदगी नहीं।

कुछ ख़ूबसूरत से पड़ाव, यदि राह में न हों ,
उस राह चलते जाना, कोई ज़िंदगी नहीं ।

ज़िंदा दिली से ज़िंदगी को जीना चाहिए,
तय रोते सफ़र करना कोई ज़िंदगी नहीं।

इस दौरे भागम भाग में सिज़दे में इश्क के,
कुछ पल झुके तो इससे बढ़कर बंदगी नहीं।

कुछ पल ठहर हर मोड़ पर खुशियाँ तू ढूढ़ ले,
उन पल से बढ़कर 'श्याम कोइ ज़िंदगी नहीं ॥

4 comments:

Mithilesh dubey 14 मार्च 2010 12:40 pm  

बहुत ही खूबसूरत गजल ।

शरद कोकास 16 मार्च 2010 1:04 am  

अच्छी गज़ल हिअ यह श्याम जी की

भूतनाथ 24 मार्च 2010 4:19 pm  

behatreen gazal.....vaah.....!!

neeshoo 28 मार्च 2010 10:46 pm  

bahut khub bahut hi sundar

आपका आना अच्छा लगता है

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