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अब तो संभल जाओ--------[कविता]----------संतोष कुमार

>> शुक्रवार, 12 मार्च 2010

ये जुल्म अत्याचार बैमानी और दहशतें क्या होगीं कभी कम ?
देख कर जिन्हें हो जाती है इंसानियत की आँखे नम
अश्लिलताऔर अराजकता को सहते रहते
जैसे कोई मूक बाधिर बेशर्म
इन्सान और ईमान तो आज कल बाजार में खिलौने की तरह बिकते हैं
कागज के चंद टुकड़े हैं इनका धर्म
जाती धर्म और मजहब के नाम पर दंगे होते रहते
क्या मिटेगा कभी ये झूठा भ्रम ?
मै "हिन्दू" तू "मुसलमान" तू "सिख" मै "इसाई"
राजनैतिक और मजहबी संस्थाओं ने हमारे दिलो दिमाग में भर दिया है
ये वहम
भारत की सभ्यता और संस्कृति अब मिट सी रही है
क्या अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचा पाएंगें हम
आज की फिल्में खुलेआम कर रहीं है अश्लिलता का प्रदर्शन
हमारी "सरकार" को शायद नहीं है कोई गम
ये जुल्म अत्याचार बैमानी और दहशतें क्या होगीं कभी कम ?
देख कर जिन्हें हो जाती है इंसानियत की आँखे नम..............

1 comments:

हिन्दी साहित्य मंच 12 मार्च 2010 8:53 am  

संतोष जी बहुत ही उम्दा प्रस्तुति रही । आभार

आपका आना अच्छा लगता है

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