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मुश्किलें आती रही------[गजल]------- पुरु मालव

>> बुधवार, 10 मार्च 2010

मुश्किलें आती रही, हादिसे बढ़ते गये ।
मंज़ि़लों की राह में, क़ाफ़िले बढ़ते गये ।

दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थे
पास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।

राहरवों का होंसला, टूटता देखा नहीं
ग़रचे दौराने-सफ़र, हादिसे बढ़ते गये ।

साथ रह कर भी बहम हो न पाई ग़ुफ़्तग़ू
ख़ामशी के दम ब दम, सिलसिले बढ़ते गये ।

हम थे मंज़िल के क़रीब, और सफ़र आसान था
यक-ब-यक तूफ़ां उठा, वस्वसे बढ़ते गये ।

किस्सा-ए-ग़म से मेरे कुछ न आँच आई कभी
मेरे दुख और उनके 'पुरु' क़हक़हे बढ़ते गये ।

7 comments:

Mithilesh dubey 10 मार्च 2010 9:44 am  

बहुत ही बेहतरीन गजल , बधाई ।

निर्मला कपिला 10 मार्च 2010 10:14 am  

दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थे
पास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।
वाह बहुत खूब। बहुत अच्छी लगी गज़ल पुरू मालव जी को बधाई

निर्झर'नीर 10 मार्च 2010 5:35 pm  

बहुत खूब

राकेश कौशिक 10 मार्च 2010 7:11 pm  

वाह वाह - बहुत खूब

श्रद्धा जैन 10 मार्च 2010 7:24 pm  

दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थे
पास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।

ye sher behad pasand aaya

venus kesari 10 मार्च 2010 11:08 pm  

हम थे मंज़िल के क़रीब, और सफ़र आसान था
यक-ब-यक तूफ़ां उठा, वस्वसे बढ़ते गये

बहुत बढ़िया
पसंद आई

हिन्दी साहित्य मंच 12 मार्च 2010 8:54 am  

बहुत ही उम्दा प्रस्तुति रही । आभार

आपका आना अच्छा लगता है

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