तुम याद आई हो----------[के एस एस कन्हैया ]
>> मंगलवार, 9 फरवरी 2010
जब भी निदाघ में उठी है हवा, तुम याद आई हो
श्वास में जब भरी कोई सुगंधि, तुम याद आई हो
यूँ तो मंदिरों मंदिरों न कभी घूमा किया अभागा
जब भी ये सर कहीं झुका, तुम याद आई हो
फूल दैवी उपवनों के भू पर खिले हैं घर-घर में
जब भी दिखा निश्छल कोई शिशु, तुम याद आई हो
संगीत-सी ललित कविता-सी कोमल अयि कामिनी
किसी लय पर जो थिरकी हवा, तुम याद आई हो
जो तुम वियुक्त तो हर धड़कन लिथड़ी रक्ताक्त अश्रु में
कभी औचक जो मुस्कराया, तुम याद आई हो
जलती आग सी सीने में, है धुआँ-धुआँ साँसों का राज
जब फैली कहीं भी उजास, तुम याद आई हो
मरुस्थली सा जीवन, वसंत मात्र स्वप्न है सुजीत का
जब भी कूकी कोई कोकिला, तुम याद आई हो
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9 comments:
बहुत ही सुन्दर गजल लगी ।
जलती आग सी सीने में, है धुआँ-धुआँ साँसों का राज
जब फैली कहीं भी उजास, तुम याद आई हो
आपकी ये लाईंन तो दिल को छू गयी ।
बहुत सुन्दर ...........
it's a great post
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EINDIAWEBGURU
poori rachna behad lajwaab.
बहुत सुन्दर गज़ल बधाई
याद को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है आपने , सुन्दर रचना ।
हिंदी साहित्य मंच के प्रिय मित्र गण,
प्रिय नीशू जी, मिथिलेश जी, अभिषेक त्रिपाठी जी, सलोनी जी, वंदना जी, निर्मला कपिला जी,
आप को ग़ज़ल अच्छी लगी, यह मेरे लिए संतोष का विषय है.
आप सबों की प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद.
ऐसे प्रोत्साहन के शब्द निधि भी बनते हैं, सम्बल भी और आशा भी.
ई-मेल संपर्क की प्रत्याशा के साथ एक बार फिर आप सबको धन्यवाद.
kss.kanhaiya@gmail.com
Hindi shabdon ka sundar prayog kiya hai is gazal me...
Sundar rachna...
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